समस्तीपुर, मार्च 7 -- बसंत की आहट के साथ ही लीची के बागानों में मंजर दिखना सामान्य बात है। यह वह समय होता है जब किसानों के चेहरों पर उम्मीद की चमक साफ दिखाई देती है। लेकिन इस वर्ष तस्वीर कुछ बदली-बदली सी है। मंजर देर से आए हैं, कई पेड़ों पर मंजर की जगह नए पत्ते अधिक निकल आए हैं और फलन घटने की आशंका गहराने लगी है। सूबे में मुजफ्फरपुर के बाद रोसड़ा क्षेत्र लीची उत्पादन के लिए प्रमुख माना जाता है। यहां की शाही लीची अपने लाल रंग, विशिष्ट आकार और अद्वितीय स्वाद के कारण देश-विदेश में पहचान रखती है। यह केवल एक फल नहीं, बल्कि हजारों किसानों की सालाना आय और उनके सपनों का आधार है। ऐसे में यदि मंजर कम आएंगे तो इसका सीधा असर किसानों की आर्थिक स्थिति पर पड़ेगा। किसानों का कहना है कि पहले सरस्वती पूजा से पहले ही मंजर आने लगते थे, लेकिन इस बार देरी हुई ...
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