नई दिल्ली, मार्च 14 -- अपनी-अपनी समझ से हर इंसान अपने जीवन का लक्ष्य तय करता है। कोई खूब सारा दौलत कमाने का लक्ष्य चुनता है, कोई ऊंचे से ऊंचा मुकाम हासिल करना चाहता है, तो किसी का मकसद आध्यात्मिक उत्कर्ष को छूना होता है। बहुत सारे लोग पुरसुकून जिंदगी को अपना लक्ष्य बना लेते हैं। हालांकि, आज भी देश की आधी आबादी अपनी पहचान और किसी ऊंचे लक्ष्य से ज्यादा अपने बुनियादी अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही है। ऐसे में, सुनंदा पवार जैसे लोगों ने वंचित औरतों को उनका हक दिलवाने का जो रास्ता चुना है, वह मानवीय तो है ही, देशसेवा की एक बड़ी नजीर भी है। आज से करीब 66 साल पहले बारामती (महाराष्ट्र) के एक साधारण किसान परिवार में सुनंदा पैदा हुईं। यह वह दौर था, जब नया-नया आजाद हुआ देश शिद्दत से अपने सपनों को साकार करने में जुटा था। इनमें से एक बड़ा सपना लैंगिक स...