नई दिल्ली, मई 2 -- सुधीश पचौरी,हिंदी साहित्यकार एक पत्रिका ने सावधान किया है कि हे साथी, फासिज्म आ रहा है... फासिज्म आ चुका है... फासिज्म जम चुका है... फासिज्म पक चुका है... फासिज्म सबको खा चुका है। एक लेखक ने अपनी टिप्पणी में एक दर्जन से अधिक बार बताया कि फासिज्म आ चुका है। दूसरे ने कहा, वह आ ही नहीं चुका, आकर जम भी चुका है। ऐसे ही, कई कवियों की कविताओं में फासिज्म जाने कितनी बार आ चुका है, आकर जा चुका है और जाकर फिर से आ चुका है? यह इतनी बार हुआ है कि उसके आवन-जावन की गिनती करना भी मुश्किल है। इतना सारा लोकल मीडिया है, इतना सारा ग्लोबल मीडिया है, सोशल मीडिया है, एआई है। करोड़ों लोग सोशल मीडिया पर स्वतंत्र भाव से अपने को दिन-रात अभिव्यक्त करते रहते हैं। सबको पूरी आजादी है कि जो चाहें, कहें। बहुत से तो गरियाते रहते हैं। बहुत से दिन-रात शा...
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