लखनऊ, सितम्बर 23 -- हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने कहा है कि सरकारी मेडिकल संस्थानों में रियायती दर पर स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा का लाभ लेने वाले डॉक्टर अनिवार्य सरकारी सेवा बांड के तहत जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकते। न्यायालय ने कहा कि सरकार ने पीजी पाठ्यक्रमों में प्रवेश के साथ दो वर्ष की अनिवार्य सेवा की शर्त इसलिए रखी है ताकि सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों की उपलब्धता सुनिश्चित हो। मरीजों के जीवन के अधिकार की रक्षा की जा सके। प्रशासनिक स्तर पर थोड़ी देरी मात्र से बांड की बाध्यता समाप्त नहीं हो जाती। न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने एसजीपीजीआई, लखनऊ से एमडी (ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन) करने वाली डॉक्टर अपारूपा सेन गुप्ता की याचिका पर यह टिप्पणी की। याची का कहना था कि पाठ्यक्रम पूरा होने के तीन महीने के भीत...