कन्नौज, मार्च 2 -- छिबरामऊ, संवाददाता। होली का त्योहार रंगों की तड़क-भड़क से भरा होता है, लेकिन कृत्रिम यानी रासायनिक रंगों ने इसकी प्राकृतिक सुंदरता को फीका कर दिया है। लोग अब एक-दूसरे को रंगने की धुन में स्वास्थ्य को भूल जाते हैं। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी चिकित्साधिकारी डॉ.राहुल मिश्रा ने बताया कि पहले होली पर टेसू (पलाश) के फूलों से बना बसंती रंग और कुसुम की लालिमा प्रमुख होती थी, जो त्वचा के लिए फायदेमंद थी। आज यह परंपरागत रंग लगभग लुप्त हो चुके हैं। टेसू के फूलों में ब्यूटीन पिगमेंट पाया जाता है, जो त्वचा की सुंदरता बढ़ाता है और रोगों से बचाता है। इसी तरह दही, चुकंदर, हल्दी, गेंदा और हरसिंगार जैसे प्राकृतिक तत्वों से बने सुरक्षित रंगों को लोग नकार चुके हैं। बाजार में होली से पहले से ही रासायनिक रंगों की बिक्री जोरों पर ह...
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