अयोध्या, मार्च 27 -- अयोध्या। संवाददाता कलियुग में पांच सौ सालों के वनवास की समाप्ति के बाद रामलला अपने राजमहल में राजकुंवर व राजा राम दोनों स्वरुपों में प्रतिष्ठित हो चुके हैं। ऐसे में उनका वैभव उनके राजसी ठाट-बाट में भी दिखाई देता है। रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा के पहले श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ने भगवान के श्रीविग्रह के लिए पांच वर्ष के बालक के स्वरूप की परिकल्पना की थी। पुनः उसी परिकल्पना को साकार रूप में शालिग्राम शिला में गढ़ा गया और उनके " नीलाम्बुज- श्यामल कोमलागं.." के आधार पर स्वर्णाभूषणों को भी तैयार कराया गया। इसी कारण रामलला के शीश पर स्वर्ण मुकुट के स्थान पर स्वर्ण निर्मित पगड़ी बनवाई गई है। इस पगड़ी में राजकीय चिह्न भी गढ़े गए हैं।रामलला के मुकुट में उनके सूर्यवंशी होने के प्रतीक रूप में भगवान सूर्य का चिन्ह बनाया गया। इ...
Click here to read full article from source
To read the full article or to get the complete feed from this publication, please
Contact Us.