नई दिल्ली, मार्च 2 -- राजस्थान में होली का नाम लेते ही आंखों के सामने धधकती लपटें, आसमान छूती आग और उड़ते अंगारों का दृश्य तैर जाता है। लेकिन भीलवाड़ा जिले का हरणी कलां गांव इस परंपरा को एक अलग ही अर्थ देता है। यहां होलिका दहन नहीं होता-यहां होलिका की पूजा होती है। जहां बाकी जगह लकड़ियों की चिता सजती है, वहां हरणी कलां में 500 ग्राम चांदी से बनी होलिका और 10 ग्राम सोने से बने भक्त प्रह्लाद की प्रतिमा श्रद्धा के साथ विराजमान होती है। बिना धुएं, बिना चिंगारी और बिना किसी जोखिम के यहां आस्था का अनोखा उत्सव मनाया जाता है।जब एक अग्निकांड ने बदली सदीयों की परंपरा गांव के बुजुर्ग सोहनलाल तेली और घीसालाल जाट बताते हैं कि करीब 65-70 साल पहले तक यहां भी पारंपरिक होलिका दहन होता था। लेकिन एक वर्ष दहन के दौरान उठी चिंगारियां भयंकर आग में बदल गईं। फसल...
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