नई दिल्ली, मार्च 21 -- सुख के साथी सुख के सब साथी, दुख में ना कोई..., वैसे तो यह सभी पर लागू होती है लेकिन सियासी नेताओं को अक्सर इससे दो-चार होना पड़ता है। दरअसल, राजनीति में जब किसी नेता पर कोई बुरा वक्त आता है, तो पार्टी के सभी नेता और कार्यकर्ता उससे किनारा कर लेते हैं। जब वह दोबारा मुख्यधारा में लौटते हैं, तो फिर भीड़ जुटने लगती है। कई साल बाद जब कांग्रेस के एक नेता को दूसरे राज्य के चुनाव में बड़ी जिम्मेदारी मिली तो उनके दफ्तर में फिर नेताओं का तांता लगना शुरू हो गया। जब उनसे पूछा तो उन्होंने कहा कि कांग्रेस ही नहीं सभी पार्टियों में यही होता है।अपने-परायेचुनाव क्या न कराए! कहीं अपनों का सहारा है तो कहीं परायों के भरोसे जंग लड़ी जा रही है। भाजपा में यही हो रहा है। पश्चिम बंगाल और असम के चुनाव में पार्टी ने अलग-अलग रणनीति अपनाई हुई ह...
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