अररिया, अक्टूबर 7 -- बाढ़ की मार से उजड़े परिवार अब सड़क किनारे जिंदगी गुजारने को मजबूर फारबिसगंज, निज संवाददाता। फिल्म 'सड़क का मशहूर गीत 'रहने को घर नहीं, सोने को बिस्तर नहीं, अपना यही है ठिकाना... आज भारत-नेपाल बॉर्डर पर साकार रूप लेता दिखाई दे रहा है। बाढ़ की विभीषिका ने सैकड़ों महादलित परिवारों को उनके घर-आंगन से बेघर कर दिया है। अब इन परिवारों ने बॉर्डर रोड को ही अपना अस्थायी आशियाना बना लिया है। छोटे-छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक-हर कोई सड़क के किनारे खुले आसमान के नीचे जिंदगी गुजारने को मजबूर है। कुछ ने प्लास्टिक की चादरें और फटे टेंट लगाकर खुद को बारिश और हवा से बचाने की कोशिश की है, तो कुछ ने सड़क के किनारे मिट्टी पर ही बिस्तर बिछाकर रात गुजारने की आदत डाल रही है। खाना, पीना, सोना सब कुछ इसी सड़क पर हो रहा है। यही उनका अब घर और ठिकाना...
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