कौशाम्बी, फरवरी 23 -- मुकद्दस माह रमजान में रोजा केवल भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं, बल्कि दिल की सच्ची नीयत और परहेजगारी का इम्तिहान है। इस्लामी धर्मगुरुओं का कहना है कि रोजा अल्लाह की बारगाह में तभी कबूल होता है जब बंदा पूरी नीयत और खालिस इरादे के साथ इसे अदा करे। बिना नीयत के रोजा महज खान-पान से दूरी भर है। मनौरी गांव स्थित बड़ी मस्जिद के इमाम हाफिज जफर आकिल ने बताया कि रोजा रखने से पहले दिल में यह इरादा होना चाहिए कि यह इबादत केवल अल्लाह की रजा के लिए है। रोजा इंसान को सब्र, शुक्र और गरीबों के दर्द का एहसास कराता है। नीयत की पवित्रता ही रोजे को मकबूल बनाती है। रमजान का महीना रहमत, बरकत और मगफिरत का पैगाम लेकर आता है। रोजेदार सुबह सहरी से लेकर शाम इफ्तार तक न सिर्फ खाने-पीने से रुकता है, बल्कि बुराई, झूठ, चुगली और गुनाह से भी अपने आपको ब...
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