सीवान, मार्च 2 -- हसनपुरा, एक संवाददाता। माहे रमजान का मुकद्दस रोजा चल रहा है। जहां पहला अशरा खत्म हो गया है। वहीं रविवार को 11 वां रोजा रखा गया। इस पाक महीने का जिक्र करते हुए हाफीज़ ग़ुलाम रज़ा हैदरी साहब ने बताया कि रोज़ा एक ऐसी इबादत है जो इंसान के ज़ाहिर ही नहीं बल्कि उसके बातिन को भी मुनव्वर और पाकीज़ा बनाती है। रोज़ा महज़ भूख और प्यास बर्दाश्त करने का नाम नहीं, बल्कि ख़्वाहिशाते-नफ़्स को क़ाबू में करके रूह को बुलंदी अता करने का एक बा- बरकत अमल है। यह इबादत इंसान के अंदर सब्र ओ तहम्मुल का जज़्बा पैदा करती है, जिसके ज़रिये वह अपनी ज़िंदगी को बेहतर ढंग से गुज़ारने लगता है। क्योंकि इंसान के जिस्म में दो चीज़ें बड़ी अहम हैं। रूह और नफ़्स। रूह को इबादत के ज़रिये क़ुव्वत और सुकून मिलता है। जबकि नफ़्स को खाने-पीने और दुनियावी लज़्ज़तों से ...
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