युद्ध से थक चुके देशों में शांति की पहल
नई दिल्ली, अक्टूबर 22 -- एम जे अकबर,वरिष्ठ पत्रकार व पूर्व केंद्रीय मंत्री युद्ध का अंत या तो जीत के साथ होता है या फिर लड़ते-लड़ते थक जाने पर। जीत की तुलना में थकान को समझना कहीं अधिक आसान होता है, क्योंकि इसमें संसाधनों को मापा जाता है; इच्छाशक्ति जैसे संसाधन की सीमा को भी। वहीं दूसरी ओर, जीत के दो पहलू होते हैं। इसे तभी सार्थक माना जाता है, जब दुश्मन अपनी हार स्वीकार कर ले। युद्ध हमेशा खत्म नहीं होते, बेशक कोई लड़ाई थम जाए। कई बार तो वे पीढ़ियों तक चलते रहते हैं। रूस ने जारशाही सामंती व्यवस्था, कम्युनिस्ट तानाशाही और 1990 के बाद के लोकतांत्रिक दौर में भी यूक्रेन को अपनी रणनीतिक सीमा का हिस्सा माना है। यह सोच तब भी बनी रही, जब सोवियत संघ टूट गया और यूक्रेन में राष्ट्रवाद की भावना मजबूत होने लगी। यह साफ तौर पर नहीं कहा जा सकता कि पश्चिम ...
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