प्रकाशचंद गंगरांडे, मार्च 24 -- माता के गर्भ से जो जन्म होता है, उस पर जन्म-जन्मांतरों के संस्कार हावी रहते हैं। यज्ञोपवीत संस्कार द्वारा बुरे संस्कारों का शमन करके अच्छे संस्कारों को स्थाई बनाया जाता है। इसी को द्विज अर्थात दूसरा जन्म कहते हैं।मातुरग्रेऽधिजननं द्वितीयं मौञ्जि बन्धनं।(-मनुस्मृति 2.169)अर्थात पहला जन्म माता के गर्भ से होता है और दूसरा यज्ञोपवीत धारण से होता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ये तीनों इसलिए द्विजाति कहे जाते हैं। मनु स्मृति के अनुसार यज्ञोपवीत संस्कार हुए बिना द्विज किसी कर्म का अधिकारी नहीं होता। यज्ञोपवीत संस्कार होने के बाद ही बालक को धार्मिक कार्य करने का अधिकार मिलता है। व्यक्ति को यज्ञ करने का अधिकार प्राप्त हो जाना ही यज्ञोपवीत है। यज्ञोपवीत पहनने का अर्थ है-नैतिकता एवं मानवता के पुण्य कर्तव्यों को अपने...