वाराणसी, फरवरी 27 -- वाराणसी, कार्यालय संवाददाता। रमजान में सहरी के वक्त रोजेदारों को जगाने की परंपरा अब लगभग गुम हो चुकी है। कभी शहर की भोर "उठो सोने वाले, सहरी का वक्त है..." की पुकार से आबाद होती थी। मदनपुरा, लोहता, आदमपुर, जैतपुरा, बजरडीहा, कोनिया, सरैया और लल्लापुरा जैसे इलाकों में यह आवाज केवल जगाने का जरिया नहीं, बल्कि साझा तहजीब की पहचान हुआ करती थी। मदनपुरा के मोहम्मद इसहाक बताते हैं कि रमजान शुरू होने से पहले ही हर मुहल्ले में युवाओं की टोलियां बन जाती थीं। साइकिल पर स्पीकर लगाकर ये युवक नातिया कलाम पढ़ते हुए गली-गली घूमते और रोजेदारों को सहरी के लिए जगाते थे। घरों की खिड़कियां खुलतीं, लोग मुस्कुराते हुए उठते और दुआओं से इन युवाओं का हौसला बढ़ाते। ईद के दिन मोहल्लेवासी इन टोलियों को इनाम के तौर पर चंदा देते थे। बच्चे उन्हीं पैसो...