मेरठ, अप्रैल 11 -- 'दिए हैं जिंदगी ने जख्म कुछ ऐसे कि जिनका वक्त भी मरहम नहीं है' इन पंक्तियों के साथ 20 साल पहले हुए विक्टोरिया पार्क अग्निकांड को याद किया जाए तो कोई गलत नहीं होगा। शरीर के जख्म तो भर गए पर अपने से बिछड़ने का गम आज भी ताजा हैं। करीब 250 परिवारों की आंखों के सामने आज भी वह खौफनाक मंजर तैरता है। किसी ने पत्नी को खोया तो किसी के सिर से माता-पिता का साया उठ गया। दो दशक बीत गए, लेकिन उम्मीद है कि इंसाफ जरूर मिलेगा, मगर न्याय के इंतजार मे आंखें पथरा गईं हैं।पीड़ित बोले आयोजकों पर क्रिमिनल चार्ज नहीं लगायासाल 2007 के सितंबर में कोर्ट ने आयोजकों की जमानत मंजूर कर दी थी। कई वर्ष बीत जाने के बाद भी आयोजकों पर किसी तरह का क्रिमिनल चार्ज नहीं लगाया गया। 2014 में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज एसबी सिन्हा की अध्यक्षता में आयोग बना। कोर...