सराईकेला, अप्रैल 6 -- सरायकेला, संवाददाता । सोमवार से सरायकेला का राजकीय छऊ नृत्य कला केंद्र ग्रामीण कलाकारों की पदचापों और नगाड़ों की थाप से गूंज उठा। चैत्र पर्व के पावन अवसर पर आयोजित होने वाली यह प्रतियोगिता केवल एक मुकाबला नहीं, बल्कि उस विरासत का उत्सव है जिसने झारखंड को वैश्विक मानचित्र पर पहचान दिलाई है। नृत्य की रोचक ऐतिहासिक यात्रासरायकेला छऊ का विकास कलिंग के गजपति शासन (1434-1541 ई.) के दौरान हुआ था। इसे सरायकेला के राजघराने का सीधा संरक्षण प्राप्त था। कुंवर विजय प्रताप सिंहदेव (1896-1971) झारखंड के सरायकेला के एक दूरदर्शी कलाकार और प्रतिष्ठित छऊ नृत्य प्रतिपादक थे, जिन्हें आधुनिक सरायकेला छऊ का जनक माना जाता है। उन्होंने पारंपरिक मार्शल आर्ट को शास्त्रीय नृत्य शैली में बदलकर, उसमें 'चाली-उफली' और नाट्यशास्त्र का समावेश कर 1930...