नई दिल्ली, मार्च 3 -- सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923 के तहत मुआवजे की राशि जमा करने में देरी के लिए नियोक्ता पर जुर्माना देने का दायित्व तय किया है, यह कहते हुए कि यह कानून कर्मचारियों की शिकायतों के निवारण के लिए एक 'सामाजिक कल्याण कानून' है। न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और पी. बी. वराले की पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई निर्णयों में इस बात पर जोर दिया कि यह अधिनियम एक सामाजिक कल्याणकारी कानून होने के नाते कर्मचारियों के पक्ष में 'उदार और उद्देश्यपूर्ण व्याख्या' प्रस्तुत करता है। इस पीठ ने बीमा कंपनी द्वारा दायर अपील पर अपना फैसला सुनाया, जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट के मई 2025 के आदेश को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने बीमा कंपनी पर अधिनियम की धारा 4ए(3)(बी) के तहत लगाए गए जुर्माने का भुगतान करने का दायित्व निर्धारित किया था।...
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