सिमडेगा, अप्रैल 2 -- सिमडेगा हादसों में अपने परिजनों को खो चुके गरीब परिवारों की जिंदगी अब दोहरी मार झेल रही है। एक ओर अपनों को खोने का गहरा दुख, तो दूसरी ओर मुआवजा पाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने की मजबूरी। हालात ऐसे हैं कि महीनों नहीं बल्कि वर्षों बीत जाने के बाद भी कई पीड़ित परिवारों को सरकारी सहायता नहीं मिल पाई है। फाइलें आगे बढ़ने के बजाय दफ्तरों में अटकी पड़ी हैं और पीड़ित परिवार उम्मीद और हकीकत के बीच झूलते नजर आ रहे हैं। मृतकों के परिजनों का कहना है कि सबसे ज्यादा तकलीफ तब होती है जब बाद में आवेदन करने वाले कुछ लोगों को मुआवजा मिल जाता है। लेकिन पुराने मामलों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। ऐसे में लोगों का व्यवस्था से भरोसा उठता जा रहा है। उनका मानना है कि संकट के समय सहारा न मिले, तो दर्द और गहरा हो जाता है। पीड़ित परिवा...