नई दिल्ली, दिसम्बर 17 -- एक भक्त ने प्रेमानंद महाराज से पूछा कि माया क्या है और इसका उद्देश्य क्या है। चलिए जानते हैं प्रेमानंद महाराज ने क्या जवाब दिया। इस सवाल का जवाब देते हुए प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि ब्रह्म। ब्रह्म को ढक करके नानात्व का दर्शन कराना ही माया है। वेद कहता है कि ब्रह्म के सिवा किंचिन मात्र कुछ और नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि माया का कार्य है ब्रह्म के सिवा और कुछ प्रतीत करवाना। ब्रह्म का अनुभव ना होने देना। वो कहते हैं कि सर्वत्र ब्रह्म हैं, उसको आच्छादित करके और सबकुछ अनुभव कराना। स्त्री, पुरुष, धन, सुख, लाभ हानि, पर ब्रह्म का अनुभव ना होने देना। महाराज जी कहते हैं कि माया का स्वरूप क्या है-मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया॥ गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई॥ महाराज जी कहते हैं कि मा...