मां की जगह कोई नहीं ले सकता
नई दिल्ली, अगस्त 15 -- वह एक ऐसा मध्यवर्गीय अमेरिकी परिवार था, जिसमें बच्चे बड़े शरारती थे। बच्चों को न पिता टोकते थे और न मां डांटती थीं। उसी परिवार में एक बच्ची थी, जिसके दो बड़े भाई थे और दो छोटे भाई-बहन। अक्सर ऐसा होता है, मां-बाप सीधे हों, तो उनके बच्चे बहुत नाजायज हरकतों को अंजाम देते हैं। जाहिर है, बच्चों की शरारतों का बोझ मां उठाती थीं। बच्चे गंदगी करते चलते और मां पीछे-पीछे साफ करती चलती थीं। वह बच्ची भी मनमानियों से मां को परेशान किया करती थी। उसे पता था कि मां को गंभीर बीमारी है। मां काम करते-करते थकने लगी हैं। एक दिन मां काम करते-करते थककर सोफे पर बैठी थीं और वह बच्ची अपनी जिद्द लिए पहुंच गई, 'मां, चलो मेरे साथ खेलो।' मां ने मना किया, पर बच्ची अड़ गई, 'चलो खेलो, जैसे पहले खेलती थी।' मां ने फिर मना किया, तो बच्ची उनकी पीठ पर चढ...
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