दरभंगा, दिसम्बर 14 -- कुम्हार समाज पूरा परिवार पुश्तैनी कारोबार से जुड़ा रहता है। इनके हाथों की कारीगरी और आग में पकी मिट्टी की मूर्तियों, बर्तन, टाइलें आदि को टेराकोटा शिल्प का दर्जा मिला हुआ है। आधुनिक दौर में कमाई घटने से अधिकतर पुरुष दूसरे काम-धंधे से जुड़ चुके हैं और परिवार की महिलाएं व बच्चे पुश्तैनी कारोबार संभाल रहे हैं। महिलाएं दिनभर टेराकोटा शिल्प को आगे बढ़ाने में जुटी दिखती हैं। शिल्पी चुनचुन देवी, सुमन कुमारी आदि बताती हैं कि समाज की अधिकतर महिलाएं टेराकोटा मूर्तियां बनाती हैं। इसी से परिवार का गुजारा चलता रहा है। उन्होंने बताया कि आजकल बाहर से मूर्तिकार बुलाकर प्रतिमा बनाने का चलन बढ़ा है। कोलकाता, राजस्थान आदि जगहों के मूर्तिकार दरभंगा आ रहे हैं। इससे हमारा कारोबार प्रभावित हुआ है। उन्होंने बताया कि सरकार को टेराकोटा शिल्पियों ...
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