नई दिल्ली, अगस्त 16 -- घर को मनुष्य के लिए सबसे सुरक्षित स्थान माना जाता है, लेकिन विडंबना यह है कि महिलाओं और बच्चों के लिए यही घर अब भय, अपमान और हिंसा का केंद्र बनने लगा है। घरेलू हिंसा का अर्थ केवल मारपीट नहीं है, मानसिक प्रताड़ना, गाली-गलौज, धमकी, आर्थिक नियंत्रण, जबरन संबंध, उपेक्षा और लगातार अपमान भी इसके गंभीर रूप हैं। यह समस्या परिवार की निजी बात नहीं, बल्कि समाज और कानून के सामने खड़ी एक बड़ी चुनौती है। निस्संदेह, महिलाओं की सुरक्षा के लिए विशेष कानून बनाए गए हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई यही है कि महिलाएं खुद को कहीं भी सुरक्षित महसूस नहीं कर पातीं। उन्हें हर जगह हिंसा का भय सताता रहता है। घर में भी। यहां भी उन्हें अपने साथ बर्बरता होने का अंदेशा होता रहता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 की रिपोर्ट के आंकड़े इसकी पुष्टि भी...