वाराणसी, मार्च 26 -- वाराणसी, मुख्य संवाददाता। वासंतिक नवरात्र की सप्तमी तिथि। रात्रि का समय। काशी का मणिकर्णिका घाट। किनारे पर चिताएं धधक रही हैं। दूर खड़े परिजन दिवंगत स्वजनों को राख होते देख रहे हैं। कोई रो-रोकर चिता को देख रहा है तो कोई अवाक हो जड़वत खड़ा है। इसी बीच ध्वनि विस्तारक यंत्र पर उद्घोषणा गूंज उठी। '... और अब काशी की नगर वधुएं बाबा महाश्मशान नाथ को नृत्यांजलि अर्पित करेंगी।'मौजूद लोग विस्मय भाव से इधर-उधर देखने लगे। यह उद्घोषणा कहां से की जा रही है। घाट पर निर्माण कार्य में प्रयोग की जा रही मशीनें और मलबा ही दिख रहा था। स्थान के अभाव में नगरवधुओं ने बाबा महाश्मशान नाथ को नृत्यांजलि अर्पित की। इसके ठीक बाद 'डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे...' भक्ति रचना लाउडस्पीकर पर मुखर हुई और मंदिर में नगर वधुओं ने नृत्य आरंभ कर दिया। हर-हर महाद...
Click here to read full article from source
इस लेख के रीप्रिंट को खरीदने या इस प्रकाशन का पूरा फ़ीड प्राप्त करने के लिए, कृपया
हमे संपर्क करें.