मथुरा, जनवरी 1 -- डिजिटल युग की तेज रफ्तार ने बच्चों की दुनिया को पूरी तरह बदल दिया है। कभी दादी-नानी की कहानियों में संस्कार और रिश्तों का पाठ सीखने वाला बचपन आज मोबाइल, टीवी और इंटरनेट की स्क्रीन में सिमटता जा रहा है। बढ़ता स्क्रीन टाइम न सिर्फ बच्चों को अपनों से दूर कर रहा है, बल्कि पारिवारिक संवाद और सांस्कृतिक मूल्यों की डोर भी कमजोर पड़ती जा रही है। बच्चों और बुजुर्गों के बीच बढ़ती दूरी सामाजिक ताने-बाने को कमजोर कर रही है। हिन्दुस्तान के बोले मथुरा संवाद में लोगों ने अपने विचार साझा किए। कभी घर की सबसे सुकून भरी घड़ी वह होती थी, जब बच्चे दादी-नानी के पास बैठकर उनकी कहानियां सुना करते थे। उन कहानियों में राजा-रानी ही नहीं, बल्कि जीवन के संस्कार, नैतिक मूल्य और रिश्तों की अहमियत छिपी होती थी। दादी-नानी की गोद बच्चों की पहली पाठशाला मानी ...
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