नई दिल्ली, फरवरी 26 -- किसी भी लोकतांत्रिक समाज में भ्रष्टाचार का प्रश्न अत्यंत संवेदनशील और दूरगामी परिणाम वाला विषय होता है। अभी भारत में यह बहस तेज है कि क्या स्कूली बच्चों को न्यायिक व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं, जैसे- भ्रष्टाचार, मुकदमों की लंबित संख्या और न्यायाधीशों की कमी के बारे में पढ़ाया जाना चाहिए? बेशक यह बहस उचित है कि बच्चों को किस उम्र में किस प्रकार की नागरिक शिक्षा दी जानी चाहिए, लेकिन एक बात स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार जैसे विषय को केवल पाठ्य-पुस्तकों से हटाकर सार्वजनिक चर्चा से समाप्त नहीं किया जा सकता। हमें यह समझना होगा कि कार्यपालिका और विधायिका जहां राजनीतिक वातावरण में कार्य करती हैं और चुनावी जवाबदेही के अधीन रहती हैं, तो वहीं न्यायपालिका की वैधता उसकी निष्पक्षता, स्वतंत्रता और नैतिक गरिमा पर टिकी होती है। यही कारण है ...
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