नई दिल्ली, मई 31 -- पंकज चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार भारत की ऊर्जा नीति इस समय एक बड़े परिवर्तनकारी मोड़ पर खड़ी है। खाड़ी के देशों के कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता कम करने और विदेशी मुद्रा भंडार बचाने की छटपटाहट ने 'इथेनॉल सम्मिश्रण' को एक जादुई समाधान के रूप में पेश किया है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री का यह विजन कि 'पेट्रोल पंप नहीं, अब खेतों से चलेगा इंजन', सुनने में जितना लुभावना व क्रांतिकारी लगता है, धरातल पर इसके सामाजिक, आर्थिक और पारिस्थितिक प्रभाव उतने ही चिंताजनक हैं। प्रश्न केवल तकनीक या ईंधन के विकल्प का नहीं है, बल्कि प्रश्न हमारे बुनियादी कृषि चक्र, जल सुरक्षा और देश की खाद्य सुरक्षा के भविष्य का है। सबसे बुनियादी चिंता तो 'भोजन बनाम ईंधन' के अंतर्द्वंद्व की है। भारत एक विशाल आबादी वाला देश है, जहां आज भी कुपोषण व ...