धर्मशाला, मार्च 25 -- भारत में इतिहास लेखनकी शैली और दृष्टि दुनिया से थोड़ी अलग है। इस दृष्टि और शैली से अनभिज्ञता के कारण पश्चिमी इतिहासकार और यह मान बैठते हैं कि भारत में इतिहास लेखन की कोई परम्परा नहीं रही है। यह मान्यता वास्तविकता से कोसों दूर है। इतिहास लेखन की भारतीय शैली में तथ्यों को नीरस के बजाय आलंकारिक और सरस शैली में प्रस्तुत किया जाता है। इसलिए नीलमत पुराण और राजतंरगिणी जैसे ग्रंथों को पढ़ते समय इतिहास लेखन की भारतीय शैली से परिचय जरूरी हो जाता है, तभी सटीक निष्कर्षों पर पहुंचा जा सकता है। हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के कश्मीर अध्ययन केंद्र में 23 और 24 मार्च को आयोजित सेमिनार में ये बातें रखी गईं। इस दौरान मुख्य वक्ता कुलदीप चंद अग्निहोत्री ने यह भी सुझाव दिया कि राजतरंगिणी और नीलमत पुराण को इतिहास के सिलेबस में भी श...