नई दिल्ली, मई 23 -- पुरी में जगन्नाथ मंदिर से बस एक जिला दूर गांव सोबाला है, जहां एक अबोध बालक स्थानीय नाटक या यात्रा मंडली में काम करता था। अक्सर बालिका का अभिनय करता। कभी कोई वाद्य बजाता, तो कभी कुछ गाने का मौका भी मिल जाता। एक दिन वह बहुत भाव से ओडिया गीत गा रहा था, भाव कुछ इस प्रकार थे- हे मन भ्रमर तुम्हारा इस पुष्प में ज्यादा नहीं ठिकाना। वहां पास ही मौजूद स्थानीय संगीत शिक्षक बेनुधर परिडा बालक की आवाज सुन भाव-विभोर हुए जा रहे थे। वह सुनते ही समझ गए थे कि यह आवाज गांवों या यात्रा में खो जाने के लिए नहीं है। उन्होंने आगे बढ़कर उस बालक-गायक से संपर्क साधा और कहा, तुम पर भगवान जगन्नाथ की कृपा दिख रही है। तुम में प्रतिभा है। तुम संगीत की अच्छी सेवा कर सकते हो। बालक ने भी अपनी व्यथा-कथा सुनाई कि मैं अनाथ हूं। कुछ समय पहले मां का स्वर्गवास...