रिषिकेष, अप्रैल 26 -- प्रसिद्ध भारतीय दार्शनिक, आध्यात्मिक शिक्षक और लेखक आचार्य प्रशांत ने कहा कि भगवद्गीता को केवल धार्मिक ग्रंथ मानना उसकी गहराई को सीमित करना है। गीता तुम्हें सुलाने के लिए नहीं, बल्कि जगाने के लिए है। यदि तुम गीता सुनने के बाद भी वैसे ही जी रहे हो जैसे पहले जी रहे थे, तो समझ लो कि तुमने गीता को वास्तव में सुना ही नहीं। रविवार को स्वामीनारायण आश्रम के सामने आस्था पथ पर वैचारिक जागरण सत्र का आयोजन किया गया। सत्र की शुरुआत में आचार्य प्रशांत ने भगवद्गीता के युद्ध को बाहरी युद्ध के बजाय आंतरिक संघर्ष के रूप में समझाया। उन्होंने कहा कि कुरुक्षेत्र कहीं बाहर नहीं है, बल्कि वह मनुष्य के भीतर ही है। उन्होंने कहा कि लोग यहां शांति खोजने आते हैं, लेकिन गीता शांति का वादा नहीं करती। गीता पहले हमारे भीतर के झूठ को तोड़ती है, और ज...