भक्ति केवल कर्मकांड नहीं, भीतर के दोषों को दूर करने की साधना: स्वामी निरंजनानंद
मुंगेर, अगस्त 13 -- मुंगेर। योग विद्यालय के संन्यास पीठ में चल रहे चातुर्मास अनुष्ठान के दौरान आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन गुरुवार को परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और त्याग की आध्यात्मिक अवधारणाओं की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि भक्ति का उद्देश्य मनुष्य की भावनाओं को संतुलित कर उन्हें ईश्वर की ओर ले जाना है। भक्ति केवल पूजा-पाठ या बाहरी कर्मकांड नहीं, बल्कि अपने भीतर के दोषों को पहचानकर उन्हें दूर करने और जीवन को सजग बनाने की साधना है। स्वामीजी ने कहा कि, ज्ञान का सीधा संबंध केवल बुद्धि से नहीं है। जब अनुभव और चिंतन जीवन में उतरते हैं तथा हमारी दृष्टि को बदलते हैं, तभी वास्तविक ज्ञान का उदय होता है। सफलता के क्षणों में व्यक्ति को स्वयं को खोजने की आवश्यकता कम महसूस होती है, जबकि असफलता उसे अपने भीतर देख...
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