मिर्जापुर, जून 8 -- अखाड़ा रह गया सिर्फ नाम का... जहां कभी मिट्टी ललकारती थी। दंड-बैठक, मल्ल युद्ध और 'जोर लगाओ पहलवान' की गूंज सुनाई देती थी। जा पकड़, कमर नीचे कर, वाह बेटा जोर लगा... ये किसी फिल्म का सीन नहीं, अखाड़े की तस्वीर है। माटी में रचा-बसा महावीर पार्क एक समय कुश्ती के दीवानों का तीर्थ था। यही वह ऐतिहासिक धरती है, जहां कोमल पहलवान ने अनुशासन, परंपरा और पुरुषार्थ की नींव रखी थी। यहां स्थित अखाड़ा जीवन गढ़ने का स्कूल था। आज वही अखाड़ा अंधेरे में है। अखाड़े को दुरुस्त कराने की पहलवानों ने मांग की है। पूर्वांचल की पहलवानी परंपरा के सशक्त स्तंभ रहे स्व. कोमल पहलवान का नाम आज भी श्रद्धा और गर्व से लिया जाता है। कभी घोड़े शहीद स्थित महावीर पार्क कुश्ती, व्यायाम और चरित्र निर्माण की जीवंत पाठशाला हुआ करता था, जो स्व. कोमल पहलवान की तपस्...
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