मथुरा, फरवरी 28 -- बदलते समय के साथ होली का स्वरूप भी बदला है। ब्रज के लोक जीवन में पहले जहां होली का त्योहार एक उत्सव के रूप में मनाया जाता था। वहीं अब यह त्योहार सिर्फ औपचारिकता ही बन कर रह गया है। न तो अब घर-आंगन गुंजिया से महकता है और न ही गोबर की गुलरियां ही बनती हैं। अब मेहमान भी ज्यादा नहीं आते हैं। कुल मिलाकर यह त्योहार भी रेडीमेड हो गया है। सब कुछ बाजार पर ही निर्भर है। समय की व्यस्तता ने इस त्योहार की वास्तविक रंगत ही घरों से गायब करनी शुरू कर दी है। ब्रज की होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि प्रेम, भक्ति और रास-परंपरा का जीवंत प्रतीक है। मान्यता है कि फाल्गुन मास में श्रीकृष्ण और राधा गोकुल और बरसाना की गलियों में सखियों-गोपियों संग फाग खेलते थे। उस समय न केमिकल रंग थे और न आधुनिक साधन। टेसू के फूलों, केसर और अबीर-गुलाल से प्...