भागलपुर, मार्च 1 -- शहर से लेकर गांवों तक होली की तैयारी चल रही है। बाजार में दुकानें सज चुकी हैं। गांवों में रंगों के त्योहार को लेकर अब पहले वाला उत्साह नहीं दिख रहा है। बदलते जमाने के साथ होली का स्वरूप भी बदलता जा रहा है। एक जमाना था जब बसंत के आगमन के साथ गांवों में होली के लोकगीत की गूंज गलियों में सुनाई देने लगती थी। होली के परंपरागत व द्विअर्थी गीत गांवों की गलियों और सार्वजनिक स्थानों पर गाये जाते थे। होली के एक दिन पहले धुरखेली की परंपरा भी धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। होली के एक दिन पहले मिट्टी के खेल की परंपरा थी। लोग एक-दूसरे को कीचड़ आदि लगाकर खुशी का इजहार करते थे। मिट्टी के साथ गांव की गंदगी को भी लोग दूसरों पर फेंक देते थे। धूल, कीचड़, राख, गीली मिट्टी आदि का उपयोग धुरखेली में करते थे। धुरखेली में युवाओं की रुचि अधिक रह...
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