प्रतापगढ़ - कुंडा, दिसम्बर 23 -- मुंशी प्रेमचंद ने जिस पूस की रात का वर्णन खेतों में रात बिताने वाले हलकू की मुश्किलों के लिए किया था, आज गांव-गांव वह हालात दिख रहे हैं। हर गांव में हलकू पूस की रात में फसल बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इसके बाद भी उनकी फसल बचाने का प्रयास कारगर नहीं हो रहा है। मेहनत की गाढ़ी कमाई पर न केवल निराश्रित मवेशी बल्कि नीलगाय और जंगली सुअर हमला कर सब बर्बाद कर दे रहे हैं। फसल बचाने के लिए जूझ रहे किसानों ने आपके अपने अखबार 'हिन्दुस्तान' से बातचीत में कहा कि कोई भी यत्न काम नहीं आ रहा है। फसल बचाने के लिए भीषण ठंड में भी रातों को जागना पड़ रहा है। रात में 6-7 डिग्री सेल्सियस के आसपास तापमान, सर्द हवाओं में लोग जहां रजाई-कंबल के बाहर पैर निकालने को नहीं तैयार हैं वहीं किसानों को अपनी फसल की सुरक्षा के लिए नींद नही...
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