बलिया, मार्च 3 -- बलिया। फाग गीत में अध्यात्म है, दर्शन है। हंसी-ठिठोली के साथ होली के रंग तो हैं ही। फाग गीतों की समृद्ध विरासत सहेजने के साथ ही उससे नई पीढ़ी को रू-ब-रू कराते गड़हांचल के पुरनियों ने पारम्परिक गीतों को फूहड़ता और आधुनिकता से बदरंग नहीं होने दिया है। दलान में सजे गोल में परंपरागत वाद्य 'डाफ' पर पूरे जोश से पड़ती थाप और उम्र को पीछे छोड़ती ऊर्जा से भरी इनकी तान श्रोताओं को रोमांचित कर देती है। परंपरा के वाहक कलाकार होली के फूहड़ गीतों से बेहद आहत हैं। उनका मानना है कि ग्रामीण संस्कृति और परंपराओं को बचाए रखने के लिए फाग गीतों का चलन नहीं रुकना चाहिए। रिज में हरि होरी मचाई, इत से आवत नवल राधिका, उत से कुंवर कन्हाई। खेलत फाग परस्पर हिल मिल, शोभा बरनी न जाई, घरे-बजत बधाई...'-इस तरह के गीतों की महफिल होली के दस दिन पहले से गड़...
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