बोले प्रयागराज : व्यावसायिक खेती को बढ़ावा मिले तो बदल सकती है किसानों की तकदीर
गंगापार, मार्च 13 -- दो से तीन दशक पहले क्षेत्र के गांवों में परंपरागत तरीके से खेती की जाती थी। किसान बैलों की जोड़ी रखते थे और खेतों में हल चलाकर फसलें उगाते थे। उपजाऊ भूमि होने के बावजूद सिंचाई के साधन उपलब्ध न होने के कारण अधिकतर ज्वार, बाजरा, अरहर, सरसो, अलसी, उड़द, मूंग, जौ और कहीं कहीं गेहूं की खेती की जाती थी। बाद में कुछ गांवों तक नहरें पहुंची तो धान और गेहूं की खेती होने लगी। समय बदलने के साथ धीरे धीरे बैलों की जगह खेतों की जोताई, बोआई, मड़ाई आदि का कार्य ट्रैक्टर से होने लगा और किसानों के दरवाजे से बैलों की जोड़ी गायब हो गई। किसानों द्वारा अपने खेतों में निजी नलकूप लगा लिए गए जिससे उन्हें सिंचाई के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी मिलने लगा और खेती करने का ढंग बदल गया। अब क्षेत्र में अधिकतर धान और गेहूं की खेती पर जोर दिया जाने लगा। सि...
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