भागलपुर, मार्च 13 -- -प्रस्तुति : ओमप्रकाश अम्बुज कटिहार जिले के कई गांवों में आज भी मिट्टी से जीवन गढ़ने की परंपरा जीवित है। कभी हाथ से चलने वाले चाक पर दिन-रात मेहनत कर कुल्हड़ और बर्तन बनाने वाले कुंभकार अब समय के साथ तकनीक का सहारा ले चुके हैं। बिजली से चलने वाले आधुनिक चाक ने उनकी मेहनत जरूर कम की है और काम की रफ्तार बढ़ाई है, लेकिन बाजार की सच्चाई आज भी उनके लिए चुनौती बनी हुई है। समेली प्रखंड के तेज नारायण पंडित बताते हैं कि पहले हाथ से चाक घुमाकर एक-एक कुल्हड़ बनाना बेहद मेहनत का काम होता था। अब बिजली से चलने वाली मशीन से कम समय में दर्जनों कुल्हड़ और गिलास तैयार हो जाते हैं। पहले दिनभर में जितना बनता था, अब उतना कुछ घंटों में बन जाता है। लेकिन मेहनत के हिसाब से आमदनी नहीं बढ़ी, वे कहते हैं। मिट्टी के इन बर्तनों को बनाने की प्रक्र...
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