भागलपुर, फरवरी 12 -- -प्रस्तुति: ओमप्रकाश अम्बुज, मोना कश्यप कटिहार समेत पूरा सीमांचल कभी दलहन की खेती के लिए जाना जाता था। गांव-देहात की हर रसोई में दाल-रोटी और दाल-भात आम भोजन हुआ करता था। मूंग, मसूर और अरहर की खुशबू खेत से लेकर चूल्हे तक महसूस होती थी। लेकिन वक्त के साथ खेती की तस्वीर बदली और मुनाफे की दौड़ में दलहन, खासकर मूंग की खेती हाशिये पर चली गई। आज वही इलाका, जो कभी मूंग की उपज के लिए प्रसिद्ध था, बाजार से महंगी दाल खरीदने को मजबूर है। किसानों का कहना है कि दलहन की खेती में अब वाजिब कीमत नहीं मिलती। लागत ज्यादा और मुनाफा कम होने के कारण किसान मूंग की जगह मक्का, केला और सूर्यमुखी जैसी फसलों की ओर तेजी से मुड़ गए हैं। इन फसलों में जोखिम कम और आमदनी ज्यादा है। नतीजा यह हुआ कि मूंग की खेती धीरे-धीरे सिमटती चली गई। ग्रामीण इलाकों मे...