कुशीनगर, फरवरी 4 -- गंगेश्वर त्रिपाठी पडरौना। दर्द जब निजी हो तो अक्सर इंसान टूट जाता है। लेकिन, कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो अपने ही संघर्ष को दूसरों की ताकत बना देते हैं। कुशीनगर की जागृति पांडेय ऐसी मिसाल हैं, जिन्होंने यह साबित किया है कि कैंसर जैसी घातक बीमारी भी उस इंसान को नहीं हरा सकती, जिसके भीतर जीने का जज्बा और दूसरों के लिए कुछ करने की चाहत हो। बेइंतहा दर्द से उम्मीद की 'जागृति' तीसरी बार भी कैंसर से नहीं हारी हैं। वह आज भी संघर्ष कर रहीं हैं। पहले ब्रेस्ट में, फिर रीढ़ की हड्डी में और अब फेफड़े में खतरनाक बीमारी पहुंच चुकी है। 33 वर्षीय जागृति पांडेय का मायका अधार छपरा गांव में है। उनके पिता स्वर्गीय ओंकार नारायण पांडेय नेहरू इंटर कॉलेज में प्रवक्ता रहे। नवंबर, 2020 में उनकी शादी रामकोला निवासी अमर पांडेय से हुई। जागृति शिक्षा...