गिरडीह, अक्टूबर 4 -- पीरटांड़। धन, साधन, प्रतिष्ठा और प्रसिद्धि सुख के पर्याय नहीं हैं। व्यक्ति भौतिक रूप से संपन्न हो सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि वह भीतर से प्रसन्न हो। संपन्नता बढ़ने के साथ इच्छाएं और अपेक्षाएं भी बढ़ती जाती हैं। ऐसे में बाहरी साधनों में सुख तलाशना जीवन की बड़ी भूल है। उक्त बातें राष्ट्रसंत मुनि श्री 108 प्रमाण सागर महाराज ने श्री सम्मेद शिखरजी मधुबन स्थित गुणायतन में आयोजित धर्मसभा में कहीं। आयोजित प्रवचन सभा में मुनि श्री ने संपन्नता, प्रसन्नता, सफलता और सार्थकता के बीच का अंतर समझाया। कहा कि मनुष्य को केवल धन और सफलता की नहीं, बल्कि शांति, संतुष्टि, प्रसन्नता और जीवन की सार्थकता की भी आवश्यकता है। धन सुविधाएं उपलब्ध करा सकता है, लेकिन शांति नहीं दे सकता। साधन जीवन को अनुकूल बना सकता है, लेकिन संतुष्टि नहीं। इसलिए धन ...