सासाराम, जुलाई 23 -- परसथुआ, एक संवाददाता। ग्रामीण इलाकों में कभी आषाढ़ और सावन का महीना कजरी गीतों की मधुर धुनों से गूंज उठता था। खासकर धान की रोपाई में जुटी महिलाएं बारिश की फुहारों के बीच पूरे उत्साह और लय के साथ कजरी गाती थीं। खेतों के किनारे से गुजरने वाले राहगीर भी इन लोकगीतों को सुनने के लिए ठिठक जाते थे। लेकिन, बदलते समय के साथ अब गांवों के बधारों में सावनी कजरी की वह मिठास सुनाई नहीं देती। यह भी पढ़ें- Gangapar News: सावन की आहट के साथ झूलों पर गूंजने लगे गीत यह भी पढ़ें- Gangapar News: खेल मैदान में भरा पानी, कहां खेलें बच्चे

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