गंगापार, मार्च 2 -- फाल्गुन माह कब आया कब चला गया अब पता ही नहीं चलता है। पहले फाल्गुन का महीना आते ही जो उल्लास गांव-गांव में झरने की तरह बहता था, वह अब स्मृतियों की परतों में सिमटता नजर आ रहा है। धोकरी गांव की 110 वर्षीय छविराजी देवी व अन्य बुजुर्गों से होली के बारे में बात करने पर उनकी आंखे चमक उठती है। बताती है कि बसंत पंचमी के दिन ही होलिका दहन स्थल पर जाल रखा जाता था, जिसमें पांच गोबर के उपले और बेर की कांटेदार डाल शामिल होती थी। उसी दिन से फगुआ गीतों का सिलसिला आरंभ हो जाता था। रोज शाम को खेत-खलिहान के काम से निवृत्त होकर गांव के लोग चौपाल पर इकट्ठा होते, ढोल-मजीरे की थाप पर देर रात तक फाग गाते और दिनभर की थकान को गीतों में बहा देते। फाल्गुन पूर्णिमा की रात होलिका दहन के बाद दूसरे गांवों के लोग गाजा-बाजा लेकर पहुंचते थे।होलिका की र...
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