बिहारशरीफ, मार्च 5 -- बदलती परंपराएं: फीकी पड़ती होली गीतों की पुरानी रवायत, सहेजने की जरूरत पावापुरी, निज संवाददाता। होली का पर्व कभी सिर्फ रंगों और उत्साह का प्रतीक नहीं था, बल्कि यह लोकसंस्कृति, सामूहिकता और आत्मीय मेल-जोल का जीवंत उत्सव हुआ करता था। गांवों और मोहल्लों में फाग गाने वाली टोलियां ढोलक, मंजीरा और झाल की थाप पर घर-घर जाकर पारंपरिक होली गीत प्रस्तुत करती थीं। लोग अपने द्वार पर उन्हें ससम्मान बुलाते, गुजिया-ठंडाई से स्वागत करते और देर रात तक फाग की महफिलें सजती थीं। वह दृश्य सामाजिक एकता और सांस्कृतिक समृद्धि की मिसाल माना जाता था। समय के बदलाव के साथ यह परंपरा अब धीरे-धीरे फीकी पड़ती नजर आ रही है। डीजे और आधुनिक गीतों की तेज धुन पर नृत्य का चलन बढ़ गया है, जिससे पारंपरिक फाग और लोकगीतों की मधुरता पीछे छूटती जा रही है। नई पी...