वाराणसी, मई 18 -- वाराणसी, मुख्य संवाददाता। आज की कविता का दृष्टि केंद्र बंटा हुआ है। वह कविता के साथ कम, मंचों और अन्य जगहों पर ज्यादा दिखाई पड़ती है और अपनी बात कभी गजल, दोहे, गीत-कुंडलिया और हाइकु तो कभी गद्य कविता के माध्यम से कहती है।

कविता के विभाजन पर चर्चा ये बातें प्रो. शशिकला त्रिपाठी ने कहीं। वह रविवार को काशी लेखन मंच (कलम) की मासिक कवि गोष्ठी को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रही थीं। उन्होंने युद्ध और सांप्रदायिक सद्भाव को लेकर अपनी कविताएं भी पढ़ीं। संस्था के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. विनय मिश्र ने कहा कि बनारस में भी कविता अलग-अलग कुनबे में बंटी हुई है जबकि कविता का काम सबको एक साथ लेकर चलना है। उन्होंने अपने कई दोहों और गजलों का पाठ किया। उनकी एक पंक्ति यूं रही- 'रचना के जनतंत्र में जिसमें जितना ताप, तय करती है आग ये कहां खड़े ...