नई दिल्ली, जुलाई 9 -- अनुराग बेहर,सीईओ, अजीम प्रेमजी फाउंडेशन पिछले हफ्ते एक स्कूल में गया था, जहां एक शिक्षक करीब 20 छात्रों से 'भिन्न' का सवाल हल करा रहे थे। बच्चों ने कागज को आधे और चौथाई हिस्सों में मोड़ रखा था। वहां हलचल, रंग और चहल-पहल थी। कक्षा समाप्त होने पर जब कुछ बच्चों से पूछा कि भिन्न क्या होता है, तो वे अवाक रह गए। उन्होंने अपने हाथों में मुड़े हुए कागज को देखा और फिर मुझे देखा। उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं था। शिक्षक ने कक्षा में अभ्यास तो करा दिया, लेकिन कोई बच्चा सीख नहीं पाया था। इसमें शिक्षक की कोई गलती नहीं थी। वह पूरी ईमानदारी से वही करा रहे थे, जिसे अच्छी पढ़ाई मानी जाती है। गलती एक ऐसी बौद्धिक चूक में थी, जिसने दो दशकों से स्कूली शिक्षा का बेड़ा गर्क कर रखा है। हम अभी भी इसके नतीजे भुगत रहे हैं। यह गलती 'रचनावाद' (क...