कानपुर, सितम्बर 25 -- कानपुर, प्रमुख संवाददाता। खांसी आई तो मौसम का असर समझकर टाल दिया, सीढ़ियां चढ़ते ही सांस फूलने लगी तो कमजोरी मान ली और सीने में जकड़न को भी नजरअंदाज कर दिया। फेफड़ों की बीमारी के साथ अस्पताल पहुंच रहे मरीजों की कहानी कुछ ऐसी ही है। मुरारी लाल चेस्ट अस्पताल के आंकड़े बताते हैं कि यहां इलाज कराने आने वाले हर चार में तीन मरीज स्मोकर हैं। वहीं हर चार में एक मरीज ऐसा है, जिसने कभी बीड़ी-सिगरेट पी ही नहीं। अस्पताल में हर महीने करीब छह हजार मरीज फेफड़ों की बीमारी का इलाज कराने पहुंच रहे हैं और इनमें करीब 40 फीसदी लंबे समय तक लक्षणों को टालते रहे। चेस्ट विशेषज्ञों के अनुसार, धूम्रपान फेफड़ों की बीमारी का बड़ा जोखिम कारक है। इसके अलावा ट्रैफिक का धुआं, वायु प्रदूषण और धूल के लगातार संपर्क में रहने से भी फेफड़ों पर असर पड़ सकत...