गोरखपुर, अप्रैल 20 -- गोरखपुर, हिटी। फसल अवशेष जलाने की परंपरा किसानों के लिए तात्कालिक समाधान जरूर लगती है, लेकिन इसके दीर्घकालिक नुकसान सामने आ रहे हैं। विशेष रूप से गेहूं की पराली जलाने से मिट्टी की उर्वरता पर गंभीर असर पड़ता है। किसान अनजाने में अपनी ही जमीन को कमजोर बना रहे हैं। उप कृषि निदेशक धनंजय सिंह ने किसानों से अपील की है कि वे फसल अवशेष का न जलाएं।पद्मश्री कृषि वैज्ञानिक डॉ. रामचेत चौधरी कहते हैं कि खेती में समय और लागत बचाने के लिए कई किसान गेहूं की कटाई के बाद पराली जला देते हैं, लेकिन वैज्ञानिक आंकड़े बताते हैं कि यह तरीका जमीन की सेहत के लिए बेहद नुकसानदायक है। एक अनुमान के अनुसार, एक एकड़ खेत में लगभग 1.5 से 2.5 टन गेहूं की पराली होती है। इसे जलाने पर मिट्टी से 10 से 12 किलोग्राम नाइट्रोजन, 02 से 03 किलोग्राम फॉस्फोरस, 2...
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