किशनगंज, जनवरी 7 -- किशनगंज, हिन्दुस्तान प्रतिनिधि कड़ाके की ठंड में ठिठुरती रानी की झोपड़ी से उठता धुआं किसी चूल्हे का नहीं, मजबूरी का संकेत है। लकड़ी के अभाव में जब पुराने कपड़े आग बनते हैं, तब गरीबी अपनी सबसे कठोर सच्चाई दिखाती है। एक ओर मां है, जो हर जलते कपड़े के साथ अपने सम्मान और जरूरतों को राख कर रही है, दूसरी ओर फटी चटाई पर बैठी उसकी एक साल की बेटी, जिसकी खामोश आंखे बहुत कुछ कह जाती हैं। उस मासूम को शायद शब्दों में भूख, ठंड और अभाव का अर्थ न आता हो, लेकिन मां की बेबसी वह महसूस कर रही है। रानी का सवाल "कपड़े नहीं जलाएँ तो क्या करें?"सिर्फ उसका नहीं, उन सैकड़ो गरीबों का सवाल है, जिनके लिए ठंड एक मौसम नहीं, रोज लड़ी जाने वाली जंग है। कड़ाके की ठंड हर साल आती है, लेकिन हर बार वही सवाल छोड़ जाती है-क्या ये शहर सिर्फ पक्के घरों और रजाइयों में सो...