वाराणसी, मई 10 -- वाराणसी, मुख्य संवाददाता। मुंशी प्रेमचंद की कहानी 'झांकी' आदर्शवादी यथार्थवाद को दर्शाती है। कहानी हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या धर्म केवल रीति-रिवाजों और सजावट में है। ये बातें प्रो.श्रद्धानंद ने कहीं। वह रविवार को लमही में 'सुनो मैं प्रेमचंद' के 1910वें सत्र में कहानी पाठ के बाद संबोधित कर रहे थे।

कहानी का अंत प्रो.श्रद्धानंद ने कहा कि कहानी का अंत प्रेमचंद के आदर्शवादी-यथार्थवाद को दर्शाता है। वे पाठकों की अंतरात्मा को झकझोर कर छोड़ देते हैं। प्रेमचंद मार्गदर्शन केंद्र ट्रस्ट की ओर से आयोजित साप्ताहिक कार्यक्रम में संतोष कुमार 'प्रीत' ने कहा कि प्रेमचंद की कहानी 'झांकी' उनके कथा-साहित्य के उस पड़ाव की रचना है जहां वह केवल मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि समाज के पाखंड और मनोविज्ञान की गहरी परतों को उघाड़ने के लिए लेखन...