नई दिल्ली, नवम्बर 25 -- पति-पत्नी के तलाक की अर्जी पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की। हाई कोर्ट ने कहा कि गर्भावस्था को क्रूरता के खिलाफ ढाल नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि पत्नी की गर्भावस्था और उसके बाद गर्भपात हो जाना, पति पर किए गए मानसिक क्रूरता के लगातार पैटर्न को खत्म नहीं कर सकता। दिल्ली हाई कोर्ट ने पति को तलाक की डिक्री (divorce decree) देते हुए, फैमिली कोर्ट के तलाक न देने के फैसले को पलट दिया। जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और रेनू भटनागर की डिवीज़न बेंच ने कहा कि मेल-मिलाप की अस्थायी अवधियां (temporary periods of reconciliation) विवाह के दौरान बार-बार किए गए दुर्व्यवहार, धमकियों और छोड़ने (desertion) जैसे कृत्यों पर हावी नहीं हो सकतीं। हाई कोर्ट ने पाया कि पति की गवाही स्पष्ट और सुसंगत (...